Tuesday, March 18, 2014
Monday, March 10, 2014
hema's kavya boond: होली आयी रे //
hema's kavya boond: होली आयी रे //: भर पिचकारी मार रंगों की बहार , मना लो आज होली आयी रे । कहीं उड़े गुलाल ,कही रंग लाल-लाल , ...
होली आयी रे //
भर पिचकारी मार रंगों की बहार ,
मना लो आज होली आयी रे ।
कहीं उड़े गुलाल ,कही रंग लाल-लाल ,
मना लो आज होली आयी रे ।
गुझिया पापड़ चिप्स से सजी है थाली,
मना लो आज होली आयी रे ।
रंगों की बौछार में मिट जाये सब रंज,
मना लो आज होली आयी रे ।
गले मिलें ऐसे जैसे हो जन्मों का साथ,
मना लोआज होली आयी रे ।
सब ओर ढोल मंजीरे का होये शोर,
मना लो आज होली आयी रे ।
खेले कोई अपने पिया संग कोई सखा संग,
मना लो आज होली आयी रे ।
कोई खेलों गुबारों में भरकर रंग हरा -लाल,
मना लो आज होली आयी रे ।
थोड़ा नाचो, थोड़ा कूदो और खाओ दोस्तों संग ,
मना लो आज होली आयी रे ।
आप सभी को शुभकामनाएं मेरी हो स्वीकार ,
मना लो आज होली आयी रे ॥
Friday, March 7, 2014
नारी दिवस
मनाते हैं महिला दिवस ? कैसा है ये परिहास है ,
जहाँ स्त्री आज भी बस है सामान की तरह ,
रोज एक खबर तो बलात्कार की मिल ही जाती है ,
फिर भी मानते हैं महिला दिवस सर उठाकर ।
जहाँ विज्ञापनों में दिखाते बदन महिलाओं के,
और बेचते हैं सामान पुरुषों के इस्तेमाल के लिए ,
है कैसी विडंबना! स्त्री के आंचल में मुंह छिपा,
जो पुरुष सीखता, अपने पैरों पर चलना है ।
उसी के आंचल को बेदाग़ करके भी नहीं थकता,
हर चाौराहे पे आँखों से उसके आंचल को चीरता ।
Wednesday, March 5, 2014
सोचती हूँ
दिल से निकले हर लफ्ज़ को शब्दों में पिरो कर ,
पन्नों पर बिखरा देने को बेचैन रहती हूँ।,
ऐसे ही खाव्बों में किसी रोज कोई आकर ,
मेरे अल्फाजों को कुछ तो सिला दे ये सोचती हूँ ॥
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वक्त के साथ सब ठीक हो ही जायेगा इसी सोच में जिए जाते हैं ,
कभी तो आएगा कोई हमें भी समझने ये हम सोचते हैं ।
आँखें राहों में पलके बिछाएं नज़र वो ढूंढती हैं।
कोई तो हमसफ़र बनने के लिए आएगा ये हम सोचते हैं ॥
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कदम लड़खड़ा न जाएं कहीं ये सोचती हूँ ,
सम्हाल ही लेंगे वो ये सोचती हूँ ,
चले जायेंगे पता था ,दामन किसी का थाम वो ,
न जाने क्यूँ उम्मीद का दामन मैं फिर भी नहीं छोड़ती हूँ ॥
Tuesday, March 4, 2014
चाहत /
मोहब्ब्त में तेरी इस क़दर होश गँवा बैठे हैं हम ऐ मेरे सनम ,
इन्तजार अब और नहीं होता आ ही जाओ ऐ मेरे सनम ||
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जिंदगी उतनी भी हसीन है नहीं ,जितनी आप समझते थे ,
नहीं तो मंजिलें आसान न हो जाती सनम ॥
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तेरी खातिर अब हम अंगारों पर चले जाना चाहते हैं ,
एक बार तो निगाहें मिला लेते ऐ मेरे सनम ॥
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जो निगाहें हमें किसी भी काबिल न समझती है ,
क्यूँ हम उन्हीं निगाहों में बसने की ख्वाहिश रखते हैं ॥
Monday, March 3, 2014
चाहत
अश्क उनकी आँखों में थे,निशां हमारे गालों पे,
दर्द उनके सीने में था,खलिश हमारे सीने में थी ।
हर अज़ीज़ से पूछते रहे,ये थी कैसे पहेली,
हर जुबां पर यही सच था ,हाय ये ही तो मोहब्ब्त थी ॥
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तुझे चाहते हैं बेइंतहाई की हद तक,
पर तेरी जिल्लतों से थक गए हैं हम ।
आरजुओं का तो पता नहीं सनम पर ,
तेरी रुसवाइयों से थक गए हैं हम ॥
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सागर सी आँखों में देखते रह गए हम,
अपने ही सीने में अपना दिल ढूंढते रह गए हम ॥
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