Friday, January 30, 2015

दास्ताँ

कुछ थे सहमे से, कुछ था सहमे से हमारे कदम,
               रखा था जिस रोज हमने आपके आँगन में अपने कदम । 
कांपता सा बदन, डरा हुआ सा था दिल हमारा ,
               रखा था जिस रोज हमने आपके आँगन में अपने कदम । 
अनजान थे वो रास्ते,अनजान सभी थे रिश्ते,
             रखा था जिस रोज हमने आपके आँगन में अपने कदम । 
हाथ थाम आपका चल पड़े आपके साथ विश्वास दिल में था भरा, 
             अर्पण किया जिन्हें सब वो सम्हालेंगे मेरे कदम 
मुश्किलों भरे इस सफर में,अनजान डर दिल में लिए पर विश्वास आप पर कर, 
            रखा आपके आँगन में कदम 
आंसू ढलक निशाँ गालों पर बनाएं 
               इससे पहले ही आपने पहलू में छिपाया आपने ,
अब कोई ख्वाहिश नहीं, बाकी न कोई शिकवा है सनम ,
                     हर भूल मेरी माफ़ करना है इल्तज़ा मेरे सनम ,
एक तमन्ना है बस इस दिल में ,
                    यूँ चलना संग मेरे मिला क़दमों से कदम ॥

Wednesday, December 31, 2014

नववर्ष की शुभकामनाएं


लो आ गया फिर एक नया साल लेकर खुशियों की सौगात,
जाते-जाते एक बार फिर याद दिल गया बीते सालों की,
फिर याद दिला गया एक बार याद मीठे बचपन की,
मोहल्ले के एक टी, वी, में एक साथ मानते नए साल की,
, याद दिला  गया मूंगफली के साथ गुड़ की ढेली की ,
साथ बैठते धूप सेंकते ठहाकों में गुजरे हसीं लम्हात की,
कुहासे की चादर असमान में और दादी की गर्म बिस्तर  की ,
याद दिला गया दादा-दादी और नानी के आशीर्वाद की ,
इंटरनेट और फोन के ज़माने में याद दिला गया ट्रंककाल की,
चिट्ठी-पत्री  हुई गुजरे ज़माने की बात की , 
अब तो फोन काल भी हुई बात बीते ज़माने की ,
हर ओर बस गूँज मची है फेसबुक और व्हाट्स आप की ,
कुछ खट्टी कुछ मीठी यादों को छोड़ स्वागत हो नयी उम्मीदों की ,
लो आ गया फिर नया साल ले कर सौगात खुशियों की॥
आप सभी को एक बार फिर से मेरी और से नववर्ष की शुभकामनाएं ॥।

Thursday, December 18, 2014

पुत्र प्यारा माँ का ,

शोर हर ओर इस तरह क्यों मचा हुआ है ,दर्द कोई बांटता क्यों नहीं उस माँ का,
सुबह गया जो काँधे पर बैग टांग ,आया नहीं अभी तक दुलारा आँख का तारा वो माँ का ,
सब अपने - अपनों को तलाशते, कोई एक तो आये आगे बढ़ कम जो करता गम उस माँ का ,
 कोई आकर इतना तो बतला जाता उस माँ, को इस जहाँ में अब नहीं है पुत्र प्यारा उस माँ का ,
बंद डब्बे में रखा था खाना माँ ने प्यार से ,क्या पता अब कोई न रहा खाने वाला लाडला उस माँ का ,
अपने पीछे की सीट पर बैठा छोड़कर जो पिता आया ,नहीं आएगा वो पुत्र प्यारा माँ का ,
आँसुंओं से दामन को भिगोती, सोचती काश आज न भेजती जो बेटे को तो साथ होता पुत्र उस माँ का ,
अपने सीने से लगा एक बार जी भर अब कभी भी न रो सकेगी ये दर्द कौन समझेगा माँ का ,
दहशतगर्दों को जन्म दिया है जिस माँ ने,किसी रोज दर्द हो ऐसा तब हाल-ए -दिल देखना है उस माँ का,तो 
अब वक्त आ गया है साथ मिल,हो जाओ एक  मिटा दो निशान ऐसे बेदर्दों  का जिन्होंने आंसू बहाया है माँ का ॥


 

Wednesday, October 29, 2014

दीप जलाऊँ तेरे संग

खुशियों और उमंग से भरा दीप लड़ियों का दीपावली है त्यौहार ,
मन हो रहा है उदास उन मासूमों की खतिर ,
नहीं है पास जिनके कोई साधन जो मनाएं वो भी एक बार ख़ुशी से त्यौहार ,
क्या लाऊँ ,क्या बनाऊँ सूची बनाने  को मन फिर भी है बेक़रार ,
मिटटी के दिए अपने द्वार जलाने को लायी हूँ मैं इस बार ,
मन में थे यह विचार हो जायेंगे रोशन शायद उनके भी  आँगन और द्वार ,
जिनके मिटटी से सने हाथों ने दिया इन दीयों को रूप और आकार ,
चमकती ,सजी दुकानों को छोड़ पीछे ले आयीं मैं शगुन के बर्तन ,
जो सजा कर बैठे थे छोटी सी दुकान को बस एक फिट के फुटपाथ पर,
सोने के नहीं, चांदी के नहीं, लाई  हूँ मैं मिटटी के भगवान घर अपने इस बार ,
शायद ऐसा करने से उन मासूम आँखों भी चमक जाएं चांदी से  इस बार ,
नकली सुगंधों से भरे फूल मालाओं को मैं छोड़ आई हूँ बाजार में इस बार ,
ख़ुशबुओं से भरे फूलों की लगाउंगी मैं माला अपने द्वार ,
टिमटिमाती बिजली की लड़ियों नहीं जलाऊँगी इस बार ,
मन में सोचा और ले आई हूँ मोमबत्ती के कुछ बण्डल मैं इस बार ,
जिनको तराशा है किसी मासूम से नेत्रहीन के हाथों ने ,
मन में है ख़ुशी और बहुत सा है सुकून यह सोचकर ,
शायद मैंने अपने संग किसी के घर को भी किया रोशन इस बार  ……
आओ सब मिलकर मनाएं इसी तरह से कुछ दीवाली और मनाएं हर त्यौहार  ॥

Tuesday, September 23, 2014

नवसंचार पर्व नवरात्रि ,

ज्ञान,समृद्धि ,अनुकम्पा से परिपूर्ण माँ के पर्व  का है प्रतीक नवरात्रि ,
बदलते हुए मौसम संग तन के नवसंचार करने का पर्व है नवरात्रि ,
हो चाहे चैत्र या हो शारदीय ,होते हैं बड़े ही शुभ दिन नवरात्रि के ,
शैलपुत्री ,ब्रह्मचारिणी ,प्रथम और द्व्तीय,चंद्रघंटा तृतीय रूप में कहलाती माँ ,
चतुर्थ रूप में कूष्माण्डा,पंचम स्कंदमाता रूप में पूजी जाती माँ ,
छठम रूप में कात्यानी ,और सप्तम कालरात्रि कहलाती माँ ,
अष्टम तेरा रूप महागौरी है माँ, नवमी में सिद्धिदात्री कहलाती माँ ,
नव रूपों से पूर्ण माँ नवरात्री में महिमा अपरम्पार हो जाती माँ ,
विषम संकटों से भक्तों की नैया पार लगाती माँ ,
करता तेरा स्नेह पूर्वक स्मरण जो उसका बेड़ा पार लगाती माँ
विष्णु प्रिय पुष्प कमल के आसन पर है विराजती तू माँ ,
चामुण्डा रूप में प्रेत पर और वाराही रूप में भैस पर विराजती है माँ ,
माहेश्वरी रूप में बैल पर,तो कौमारी रूप में मोर  पर विराजे माँ ,
आभूषणों से विभूषित ब्राह्मी रूप में हंस पर विराजे तू माँ ,
भक्तों की रक्षा करने लिए तू मदेवताओं के कल्याण हेतु
चक्र,गदा,शक्ति,हल,मूसल ,तोमर ,भाल ,त्रिशूल धारण करने वाली माँ
रौद्र रूप में तेरा दर्शन है  बहुत ही दुर्लभ माँ ,
पूर्व दिशा मैं ऐन्द्री ,अग्निकोण में अग्निशक्ति माँ ,
दक्षिणी में वाराही देवी भक्तों की रक्षा है करती माँ ,
उत्तर दिशा  कौमारी की ,ईशान  शूलधारिणी है विराजे ,
जाया और विजय  भक्तों की रक्षा करने वाली है माँ ,
जयंती,मंगला ,भद्रकाली ,कपालिनी काली,दुर्गा ,क्षमा ,
शिवा,धात्री ,स्वाहा स्वधा नामों का जिसने किया उच्चार माँ ,
कर देती हर कष्ट से उनका तो कल्याण माँ,
मधु और कैटभ संहारा माँ ,चणड और मुण्ड  को है  मारा माँ ,
शुंभ और निशुम्भ का कर मर्दन कर ,किया है सबका बेडा पार माँ ,
हे! चण्डिके सर्व बाधाओं से मुक्त करने वाली माँ ,
रोगों का नाश करने वाली,यश ,पराक्रम दिलाने वाली माँ ,
हम सबको सौभाग्य,आरोग्य और परम सुख का वर देना माँ ,
प्रचंड,दैत्यों के अभिमान को पल भर में तूने ही किया चकनाचूर माँ ,
देवी कवच ,अर्गला,कीलक और सप्तसती के पाठ  से किया जिसने भी तुझे प्रसन्न माँ ,
किया था तप जब सुरथ राजन ने तब नाश किया कोलविध्वंश दैत्य का माँ
जीवन दान दिया सुरथ को माँ ,
महिषासुर मर्दिनी ,ज्योतिरूपिणी भवबाधाएं हरने वाली माँ ,
कौमारी ,सरस्वती ,ब्रम्हाणी हे वैष्णवी तू है माँ।,
लक्ष्मी,शांति,क्षुधा ,मातृ,तृष्णा रूप में स्थित तेरे हर रूप को है नमस्कार माँ ,
साठ हजार सेनाओं वाले धूम्रलोचन का तूने ही वध किया था माँ ,
ब्रह्म ,शिव ,कार्तिकेय ,विष्णु,इंद्र समस्त देवताओं की शक्तियों से विभूषित होकर माँ
किया दैत्यों का नाश तूने माँ ,
कुमकुम अक्षत और पुष्पों से ,नैवैध ,धूप और अर्चन से माँ,
शुभ नवरात्री के शुभ पवन अवसर पर माँ
तेरे हर रूप,हर श्रृंगार के दर्शन से नवरात्री का पूजन कर माँ ,
अपने जीवन की नैया को पार लगाना हमको है माँ ,







Saturday, August 16, 2014

मिटते निशां

सत्य है,अटल है और अमिट  यह सत्य इस धरा का है,
 एक पुत्र को हमेशा वंश चलाने वाला कहा गया है ,
आज सुनाती  हूँ मैं सच्ची एक कथा है ,
एक कुल चलाने वाले के फना हो जाने की यह दर्द भरी दास्ताँ है,
एक वंश चलाने वाला लावारिसों की तरह फना हो गया है,
इस खबर ने मेरी पैरों तले जमीन को खिसका लिया है
एक पिता के सपनों को साकार करने वाले पुत्र की यह हकीकत बयां करने जा रही हूँ ,
हो जाएँ आँखें नम तो खुद से गिला न करना,
दूसरों के दुःख में रोता है हर कोई यहाँ पर ,
इंसान वो तो था सच्चा ,नेक और रहमतों से भरा  था उसका भी दिल ,
अपनों को तो मोहब्बत करता है हर कोई,
वो तो बहाता  था आँसूं दूसरों की खातिर भी ,
जीवन के नए अध्याय को शुरू करने को कदम जब उसने रखा था ,
हर ख़ुशी और गम को साथ कसमें उसने भी पत्नी संग खायीं थी ,
हर वचन बखूबी निभाता चला जा रहा था ,
नहीं था मालूम वो इतना खुशनसीब भी न था ,
दूसरों पर स्नेह लुटाने वाले को हर ख़ुशी के लिए भी तड़पना था,मालूम न था ,
अपने आँगन में गूंजे एक किलकारी ऐसी उसने भी की थी तमन्ना ,
साल दर साल बीतते रहे न हुआ आबाद उसका आँगन था ,
मंदिरों में भी उसने मस्तक अपना झुकाया था ,
मस्जिदों में भी उसने मस्तक था उसने रगड़ा ,
गिरिजाघरों की घंटियों का नाद से दिल अपना हल्का किया था ,
नहीं था कोई दर ऐसा जहाँ उसने न शीश नवाया था ,
पुकार उसकी एक रोज आसमान के फ़रिश्ते ने कुछ इस तरह सुनी थी ,
आँगन में फूल उसके भी एक रोज खिल ही गया था ,
किलकारियों से उसके मन का दरबार खिल गया था ,
अपनी हर ख़ुशी वो अपनों संग झूमते -गाते मना रहा था ,
माता -पिता का लाडला खिलखिलाते हुए यूँ बढ़ रहा था ,
वक्त बीतता रहा था ,माता पिता के साये में वो पुत्र बढ़ रहा था ,
माता के आँचल  को छोड़ वो अब रफ्ता -रफ्ता बढ़ रहा था ,
घुटनों पर चलने वाला पैरों पर खड़ा हो ये कोशिशें कर रह था ,
ऊँगली पकड़ स्नेह भरे पिता ने उसे चलना सिखा दिया था ,
तोतली सी आवाज में माँ- पापा भी कहना वो अब सीख गया था ,
उसकी हर अदा पर उनका दिल गदगद हुआ पड़ा था ,
आँखों के तारे की हर गलतियों को,
उन्होंने यूँ ही नजरअंदाज कर दिया था ,
जानते न थे जिंदगी में उनका सबसे बड़ा गुनाह यही था ,
वक्त बदला पुत्र ने भी यौवन की दहलीज में कदम रख दिया था ,
गलतियां थीं जो छोटी अब गुनाह को दस्तक दे रही थीं ,
हर रोज हर ओर से शिकायतों का सिलसिला यूँ चल पड़ा था ,
पिता की चिंता का सबब अब दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा था ,
आहिस्ता-आहिस्ता ही सही पुत्र के कदम लड़खड़ाने लग गए थे ,
अंधी थी माँ की ममता अब भी न सम्हल रही थी ,
हर गलतियों पे पर्दा यूँ डालती जा रही थी ,
सबका दुलारा था जो सबकी आँखों में अब खटक रहा था ,
हर रिश्ता उससे अपना अलग होता जा रहा था ,
पिता का था जो लाडला अब नशे के दलदल में धंसता ही  जा रहा था ,
हर गम को दिल में दबाये एक रोज पिता ने जहाँ को छोड़ दिया था ,
आमदनी का अब तो कोई  जरिया न रह गया था ,
माता की ममता ऐसी अंधी अब सम्हल न रही थी,
साजो-सज्जा का हर सामान ,बाजारों की शोभा बढ़ाने लग गया था ,
नशे की जंजीरों ने उसको कुछ तरह से जकड़ लिया था ,
घर का हर बेशकीमती सामान अब बेक़ीमत ही बिका जा रहा था ,
माँ की ममता ने उम्मीद का दामन  अब भी न छोड़ा  था ,
 पता न थो उसको उसको ही एक रोज बेघर करने की फ़िराक में वो पुत्र जी रहा था
गम की आंधियों में कब तक वो खुद को सम्हाल पाती ,
एक रोज उसका साया उस पुत्र के सर से उठ गया  था,

 

  सुना था मैंने ऐसा वो बेसहारा  अब दूसरों के टुकड़ों पर पल रहा था ,
अपना सब था जिसका दूसरों का हो गया था ,
घर का तिनका -तिनका बिका वो  छोड़ो उसका तो अब घर भी न रह गया था ,
जियेगा कैसे अब ये किसी को समझ न आ रहा था ,
तन उसका जर्जर ईमारत सा हुआ चला जा रहा था ,
एक रोज ऐसा आया उसने भी दम अपना तोड़ दिया था ,
खबर सुनी तो आँखों का कोर मेरा भी नम हुआ था ,
कुछ तो रिश्ता मेरा भी था,गोद में अपनी मैंने भी तो खिलाया  था ,
शव को उसके हस्पताल में लवारिसों सा रखा गया था ,
तोड़ गए थे अपने  जो नाता उससे, आकर उन्होंने उसके शव को ,
दो गज जमीन तो नसीब करा कर कुल का नाम भी दिया था ,
कब क्या हो ,कैसे हो ,नहीं मालूम किसी को ,
इस जीवन की यही सत्यता है ,
पर हाँ यह भी एक सत्य था  एक कुल चलाने वाला ही नासूर बन गया था ,
अपनी ही  माता पिता का नाम को वो  डुबा गया था। ……
 


Tuesday, August 5, 2014

आजादी के मायने

हर शख्स कहता है इस जहाँ से जाने वाले चमकते हैं,


 उस जहाँ में सितारे बनकर ,


जो शहीद हुए हैं हिन्दोस्तान के वास्ते ,

क्या वो भी चमकते होंगे  तारे बनकर ,


गर ऐसा है तो उनकी आँखों से बरसते होंगे ,


आसूं इस धरा पर शबनम की बूँद बनकर ,


देख कर दुर्दसा इस आजाद देश की 


मुश्किलों का सामना कर के दिलवा गए जो आज़ादी ,

गुमनामियों में खो कर नाम हमको दिखा गए हसीं सपने ,


है कोई आज ऐसा जो बन सके सुभाष चन्द्र ,


है किसी में दम इतना जो बन सके बापू महात्मा


यहाँ तो हर किसी को पड़ी है अपनी -अपनी


कैसी आजादी और  कैसी गुलामी ,


हर शख्श करने में लगा है जेब अपनी भारी ,


न याद करते हैं नेता उनकी कुर्बानियों को ,


एक -दुसरे पर छींटा -कसी करने से फुर्सत कहाँ किसी को ,


एक दिन के लिए बस याद कर लिया करते हैं उनको ,


बहाया जिन सैंकड़ों ने इस धरा पर लहू था ,


दिन आता है जब स्वतंत्रता दिवस  का ,


याद आ ही जाती है उन बेशुमार शहीदों की ,


चमचामते कपड़ों में झंडा लहराना तो याद  रहता है


पर क्या याद एक भी शहीद के नाम उनको होंगे ,


तिरंगा फहराने की परम्परा को यूँ ही साल दर साल ,निभाए जा रहे हैं ,


कैसी है ये आजादी ,जिस देश में हर नौजवान ,


नशे की बेड़ियों में यूँ जकड़ता जा रहा है ,


कैसी है ये आजादी, जो आज भी पश्चिमी सभ्यता में जकड़ा हुआ है ,


अब तो आजादी के असली मायने समझने होंगे ,


एक बार उनकी कुर्बानियों फिर से याद दिलाना होगा ,


इस देश के हर नौजवान को जागना ही होगा ,


नशे से दूर रहकर कुछ कर गुजरना होगा ,


तड़पती धरा की सिसकियों को फिर महसूस करना होगा ,


अन्यथा नहीं है दूर वो बदनसीब दिन।,


ये देश एक बार फिर से गुलामी की जंजीरों में जकड़ा होगा ॥