Thursday, April 13, 2017
Thursday, March 16, 2017
बस यूँ ही
यूँ ही दिल के आइनों में झांक कर देखो कभी,
आंख बंद करके तेरी ही सूरत निहारती हूँ,
खुली आँखों से तेरे ही सपने बुनती हूँ,
तेरी चाहत में इस कदर डूब गए गए हैं,
नज़र कोई और आता नहीं मुझको,
कोर से एक आँसू न गिर जाये इसी फ़िक्र में जिए जाती हूँ,
तेरी यादों के सहारे जिंदगी हूँ ही गुजारे जाती हूँ ॥
Wednesday, March 8, 2017
कैसी है दुविधा ये मेरी,
आँचल मेरा सरकने लगा है आहिस्ते से सर का ,
दूसरों को बेपर्दा होता देख,
नज़रें फिर भी झुका कर चलती हूँ
जिनसे परदे किया करती थी कभी मैं,
जुबाँ भी आहिस्ते से ही खुलती है, फिर भी डरती हूँ,
कहीं ज़माने में रुसवा न हो जाऊँ अपनी बेपर्दगी से,
इस कदर जमाना बदल गया है, सांसे हवा में काँप जाती हैं,
नहीं किसी का डर निगाहीं में,
अब नहीं शर्म किसी की आँखों में रह गयी है,
कैसी है दुविधा ये मेरी,
ज़माने संग चलती हूँ तो बेपर्दा होती हूँ,
दिल की सुनूँ तो उनकी नज़रें नही उठती मेरी तरफ,
==================================================================================================================
मुझे पूरा तोड़ देता है तेरा आधे मन से बात करना
मुझे उदास यूँ ही कर जाता है तेरा नज़रों को मोड़ लेना,
तू कहे न कहे, मैं समझ तेरी मन की बातों को हूँ,
मुझे हर दम सुस्त करता, तेरा मुझको न समझ पाना
दूसरों को बेपर्दा होता देख,
नज़रें फिर भी झुका कर चलती हूँ
जिनसे परदे किया करती थी कभी मैं,
जुबाँ भी आहिस्ते से ही खुलती है, फिर भी डरती हूँ,
कहीं ज़माने में रुसवा न हो जाऊँ अपनी बेपर्दगी से,
इस कदर जमाना बदल गया है, सांसे हवा में काँप जाती हैं,
नहीं किसी का डर निगाहीं में,
अब नहीं शर्म किसी की आँखों में रह गयी है,
कैसी है दुविधा ये मेरी,
ज़माने संग चलती हूँ तो बेपर्दा होती हूँ,
दिल की सुनूँ तो उनकी नज़रें नही उठती मेरी तरफ,
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मुझे पूरा तोड़ देता है तेरा आधे मन से बात करना
मुझे उदास यूँ ही कर जाता है तेरा नज़रों को मोड़ लेना,
तू कहे न कहे, मैं समझ तेरी मन की बातों को हूँ,
मुझे हर दम सुस्त करता, तेरा मुझको न समझ पाना
Thursday, January 12, 2017
रिश्तों के मायने
यही है आज के बदलते युग और स्मार्ट फ़ोन की सच्चाई
जिंदगी बदल सी गयी है आज, रिश्तों के मायने भी बदल रहे हैं,
उँगलियों पर रिश्ते यहाँ कुछ इस तरह से निभाए जा रहे हैं,
अपनों से दूर परायों को अपना बनाते जा रहे हैं,
कुछ छिपा कर तो कुछ रिश्ते खुले आम निभाए जा रहे हैं,
कोई दगा अपनों को दे रहा परदे में रह कर,
बेपर्दगी की इन्तहां कुछ इस कदर बढ़ रही है,
छिपाना था जिससे उससे ही बेपर्दा हुए जा रहे हैं,
संग दिल अज़ीज़ के बैठ परायों की बातों पे मुस्कुरा रहे हैं,
यहाँ अपने ही पानों से हर रोज़ दूर होते जा रहे हैं,
जिनसे निभानी थी मोहब्बत, उनसे ही बेवफाई किये जा रहे हैं,
यहाँ हर किसी के रिश्तों के मायने आज बदल रहे हैं ॥
Sunday, January 1, 2017
साल नया
अतीत भया जो बीत गया, कल पुराना था साल, आज नया,
किसी को दर्द बेपनाह, ख़ुशी किसी को असीम दे गया,
अपनों से जुदा कोई तो, किसी को साथ मिल गया नया,
खट्टी और मीठी यादों का फिर एक गुजर दौर गया,
फिर सुबह सूरज, एक किरण नयी संग जग गया,
भोर नयी थी रात ढले, फिर भी पुराना है सब यहाँ,
एक दिन के अंतराल पर कहते हैं क्यों फिर,
हो सबको मुबारक ये साल नया॥
Wednesday, December 28, 2016
लगता बेगाना सा है,
हर कोई अपना सा है, पर लगता बेगाना सा है,
यहाँ भीड़ में हैं सब खड़े, पर अकेले जहाँ में लगते,
हाँ, इस बदलते वक़्त में हर कोई रिस्ते तो निभा रहा है,
पर चुपचाप अपनी उँगलियों को उलझा सा रहा है,
जहाँ भर को अपने होने का अहसास दिला रहा है,
पास होकर भी अपनों से दूर हो रहे हैं सब यहाँ,
कभी सोचती हूँ तकनीक के युग में सब अच्छा सा है,
पर सब यहाँ पराया होने का अहसास दिला रहा है,
कोई अब घरों के छज्जो पर नज़र नहीं आता है,
पार्कों की चहल- पहल न जाने कहाँ गुम सी हो गयी है,
कोई घर के आंगन में अब चहचहाता नहीं है,
वो शाम ढले चौबारों में अब रौनकें कहाँ ढूंढें,
वो सर्द सुबह में धुप में सेंकते किसे ढूंढें,
अब तो दालान भी सूने हो गए हैं,
बंद कमरों में एक दुसरे के पास होकर भी दूर हम हो गए है,
दावतों में भी अब चुपचाप निवाले सरकाए जाते हैं,
दिल अज़ीज़ भी अब पराये से लगने लगे हैं,
कभी सर उठा कर चलने वाले सर झुका कर चलने लगे हैं,
व्हाट्स अप और फेसबुक की दुनिया में खोये रहे,
इनसे ही टूटते हुए रिश्तों को हमने देखा हैं,
रिश्तों के धागों में गांठ लगते हुए इनसे ही देखा है,
एक दुसरे का विशवास बिखरते हुए हमने देखा है,
नहीं कहती कि स्मार्ट फ़ोन बंद हो जाएं,
'पर ये भी नहीं चाहती, इसमें ही रिश्ते सिमट जाएं,
नहीं चाहती ये तकनिकी दुनिया खत्म हो जाये,
पर नहीं चाहती, इनसे ही रिश्ते खत्म हों जाएं॥
#AloneInWorldOfTechnology
Sunday, December 4, 2016
थोड़ा सा रामराज्य
इन दिनों कुछ लोग बदलने से लगे हैं,
पडोसी भी अब आकर दर्द बाँटने लगे हैं,
'न किसी के घर के ताले अब टूट रहे हैं,
न किसी की जेब पर अब डाके पड़ रहे हैं,
लगने यूँ लगा है की जैसे थोड़ा- थोड़ा ही सही,
देश अब रामराज्य की तरफ बढ़ रहा है,
लुट तो सब गए है सभी, फिर भी,
शिकायत न कोई दर्ज करा रहा है,
कानून भी लगता है दायरे में सिमट सा गया है,
धर्मस्थल पर अब किसी दंगाई की नज़र भी न पड़ रही है,
दुकानों में भी सन्नाटा सा पसर गया हिअ,
जिनकी जेबों में मैले- कुचले नोट होते थे,
अचानक से वो ही अमीर हो गए हैं,
बंगलों के दरबान भी साहब से रईस हो गए हैं,
नींद साहबों की उड़ती देख दबी हंसी में कहकहे लगा रहे हैं,
खुश हैं सब ये सोच कर दूसरा दुखी है,
दूध की नदियां जिस देश में थी बहती,
वहां नोट देखो नदियों में बह रहें हैं,
एक ही रात में देखो कैसी नींद उड़ाई है,
गरीबों को देखो कैसे नोटों की गड्डियां थमाई हैं,
हर रोज़ नए जुमलों से धनासेठों की कैसे नींद उड़ाई जा रही है,
चलो थोड़ा सा ही सही रामराज्य जैसे आ गया है ॥
पडोसी भी अब आकर दर्द बाँटने लगे हैं,
'न किसी के घर के ताले अब टूट रहे हैं,
न किसी की जेब पर अब डाके पड़ रहे हैं,
लगने यूँ लगा है की जैसे थोड़ा- थोड़ा ही सही,
देश अब रामराज्य की तरफ बढ़ रहा है,
लुट तो सब गए है सभी, फिर भी,
शिकायत न कोई दर्ज करा रहा है,
कानून भी लगता है दायरे में सिमट सा गया है,
धर्मस्थल पर अब किसी दंगाई की नज़र भी न पड़ रही है,
दुकानों में भी सन्नाटा सा पसर गया हिअ,
जिनकी जेबों में मैले- कुचले नोट होते थे,
अचानक से वो ही अमीर हो गए हैं,
बंगलों के दरबान भी साहब से रईस हो गए हैं,
नींद साहबों की उड़ती देख दबी हंसी में कहकहे लगा रहे हैं,
खुश हैं सब ये सोच कर दूसरा दुखी है,
दूध की नदियां जिस देश में थी बहती,
वहां नोट देखो नदियों में बह रहें हैं,
एक ही रात में देखो कैसी नींद उड़ाई है,
गरीबों को देखो कैसे नोटों की गड्डियां थमाई हैं,
हर रोज़ नए जुमलों से धनासेठों की कैसे नींद उड़ाई जा रही है,
चलो थोड़ा सा ही सही रामराज्य जैसे आ गया है ॥
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