Sunday, January 1, 2017

साल नया




अतीत भया जो बीत गया, कल पुराना था साल, आज नया,
किसी को दर्द बेपनाह, ख़ुशी किसी को असीम दे गया,
अपनों से जुदा कोई तो, किसी को साथ मिल गया  नया,
खट्टी और मीठी यादों का फिर एक गुजर दौर गया,
फिर सुबह सूरज, एक किरण नयी संग जग गया,
भोर नयी थी रात ढले, फिर भी पुराना है सब यहाँ,
एक दिन के अंतराल पर कहते हैं क्यों फिर,
हो सबको मुबारक ये साल नया॥ 


Wednesday, December 28, 2016

लगता बेगाना सा है,


हर कोई अपना सा है, पर लगता बेगाना सा है,
यहाँ भीड़ में  हैं सब खड़े, पर अकेले जहाँ में लगते,
हाँ, इस बदलते वक़्त में हर कोई रिस्ते तो निभा रहा है,
पर चुपचाप अपनी उँगलियों को उलझा सा रहा है,
जहाँ भर को अपने होने का अहसास दिला  रहा है,
पास होकर भी अपनों से दूर हो रहे हैं सब यहाँ,
कभी सोचती हूँ तकनीक के  युग में सब अच्छा सा है,
पर सब यहाँ पराया होने का अहसास दिला रहा है,
कोई अब घरों के छज्जो पर नज़र नहीं आता है,
पार्कों की चहल- पहल न जाने कहाँ गुम  सी हो गयी  है,
कोई घर के आंगन में  अब चहचहाता नहीं है,
वो शाम ढले चौबारों में अब रौनकें कहाँ ढूंढें,
वो सर्द सुबह में धुप में सेंकते किसे ढूंढें,
अब तो दालान भी सूने हो गए हैं,
बंद कमरों में एक दुसरे के पास होकर भी दूर हम हो गए है,
दावतों में भी अब चुपचाप निवाले सरकाए जाते हैं,
दिल अज़ीज़ भी अब पराये से लगने लगे हैं,
कभी सर उठा कर चलने वाले सर झुका कर चलने लगे हैं,
व्हाट्स अप और फेसबुक की दुनिया में खोये रहे,
 इनसे ही टूटते हुए रिश्तों को  हमने देखा हैं,
रिश्तों के धागों में गांठ लगते हुए  इनसे ही देखा है,
एक दुसरे का विशवास बिखरते हुए हमने देखा है,
नहीं कहती कि स्मार्ट फ़ोन बंद हो जाएं,
'पर ये भी नहीं चाहती, इसमें ही रिश्ते सिमट जाएं,
नहीं चाहती ये तकनिकी दुनिया खत्म हो जाये,
पर नहीं चाहती,  इनसे ही रिश्ते खत्म हों जाएं॥

#AloneInWorldOfTechnology



Sunday, December 4, 2016

थोड़ा सा रामराज्य

इन दिनों कुछ लोग बदलने से लगे हैं,
पडोसी भी अब आकर दर्द बाँटने लगे हैं,
'न किसी के घर के ताले अब टूट रहे हैं,
न किसी की जेब पर अब डाके पड़ रहे हैं,
लगने यूँ लगा है की जैसे थोड़ा- थोड़ा ही सही,
देश अब रामराज्य की तरफ बढ़ रहा है,
लुट  तो सब  गए है सभी, फिर भी, 
शिकायत न कोई दर्ज करा रहा है,
कानून भी लगता है दायरे में सिमट सा गया है,
धर्मस्थल पर अब किसी दंगाई की नज़र भी न पड़ रही है,
दुकानों में भी सन्नाटा सा पसर गया हिअ,
जिनकी जेबों में मैले- कुचले नोट होते थे,
अचानक से वो ही अमीर हो गए हैं,
बंगलों के दरबान भी साहब से रईस हो गए हैं,
नींद साहबों की उड़ती देख दबी हंसी में कहकहे लगा रहे हैं,
खुश हैं सब ये सोच कर दूसरा दुखी है,
दूध की नदियां जिस देश में थी बहती,
वहां नोट देखो  नदियों में बह रहें हैं, 
एक ही रात में देखो कैसी नींद उड़ाई है,
गरीबों को देखो कैसे नोटों की गड्डियां थमाई हैं,
हर रोज़ नए जुमलों से धनासेठों की कैसे नींद उड़ाई जा रही है,
चलो थोड़ा सा ही सही रामराज्य जैसे आ गया है ॥ 

Sunday, November 6, 2016

पराया सा लगने लगा है

होड़ लग गयी है फैशन की कुछ इस तरह ज़माने में,
ढकने के लिए अब तन पर कपड़ों की जगह टैटू ने ले ली है,
शर्मो हाय ताक पर रख कर फ़टे कपड़ों को ही फैशन बना लिया है,
कहीं जीन्स घुटने से फटी फैशन में शुमार हो गयी है,
कहीं एक आस्तीन ही काटने का फैशन चल पड़ा है,
जिस देश में सीता, अहिल्या सी नारी हुई हैं,
नारी उस देश की तन ढंकने को अपमान समझने लग गयी है ,
कहने वालों के मुंह बंद करने को सड़कों पर उत्तर यूँ आती हैं,
मानों उनकी जेब से कुछ रूपये चुरा लिए गए हों,
गरीबी और अमीरी कपड़ों से नापी जाने लगी है,
जिसके तन पर कपडे हों पूरे वो ही अब गरीब कहलाने लगी है,
न जाने कब और कैसे संस्कृति तार- तार होने लगी है,
हाथों में जाम और मुंह में धुआँ, संस्कारों का नया सिलसिला चल पड़ा है,
कुछ कहने से पहले बुजुर्गों के मुंह थरथराने लग जाते हैं,
खुद अपने ही घर में नज़रबंद से वो होने लगे हैं,
ये कैसा देश हो रहा है, ये चलन शुरू हो गया है,
यहाँ सब कुछ पराया सा अब लगने लगा है ॥


Wednesday, November 2, 2016

indispire शून्य सा अस्तित्व

हाँ माना शून्य की खोज आर्यभट्ट ने की थी,
पर शून्य के बिना धरा पर क्या किसी का है अस्तित्व यहाँ,
धरती भी तो एक शून्य के आकार की तरह ही है गोल,
ज़ीरो की कहानी कुछ इस तरह लिखती हूँ मैं अपनी जुबानी,
नज़रों में था नगण्य (शून्य) सा अस्तित्व  मेरा,
बस सबकी खातिर जिंदगी जिए जा रही थी एक शून्य  की तरह,
सबकी नज़रों में थी खटकती सी मैं,
फिर भी खुद की आँखों से न टपकने दिया एक मोती मैंने,
मोती भी तो आकार में होता है एक शून्य की तरह,
अचानक एक रोज़ एक हवा का झोंका मेरे मन को महका सा गया,
शून्य से निकल खुद को हीरो बनाने का रास्ता यूँ दिखा गया,
खुद में छिपे हुनर को चमकाने का हुनर वो सिखा गया,
खुद को साबित करने की राह पर निकल पड़ी कुछ इस तरह,
जीरो को जीरो से हरा कर आज मैं खड़ी हूँ एक नायिका की तरह।
indispire




Thursday, October 20, 2016

#RavanVadhh कुछ तो गरिमा को रहने दो,

राम ही तो रावण का आधार थे,
हाँ था अहंकार उस रावण में,
पर नहीं था व्यभिचार उस रावण में,
खुद ही मिट जाने के वास्ते ,
परस्त्री का अपहरण किया उसने,
स्पर्श न किया परस्त्री को,
खूबसूरती के पैमानों को न तोलो रंगों के आधार पर,
गुलाब की खूबसूरती को काँटों की चुभन सहना ही पड़ता है,
जहाँ कुर्सी के पीछे एक दुसरे पर कीचड़ उछाला  जाता है,
अब स्वच्छ राजनीती के पैमानों को संसद के भीतर  लाना है,
देश को न बेचो ऐ नेताओं, कुछ तो गरिमा को रहने दो,
इस देश के सम्मान को यूँ इस तरह न रुसवा करो,
सड़कों पर घूमते  रावणों को अब मार गिराना है,
गर्भ में पल रही हर कन्या को भी है बचाना,
जो शहीद हो जाते हैं तुम्हारी खातिर उनके सम्मान को,
हर हाल में सम्मान दिलाना है,
कानून की आँखों की पट्टी को अब है खोल न्याय सबको दिलाना है,
घर में पलते हर रावण को भी जड़ से उखाड़ फेंकना है,
सोने की चिड़िया कहलाने वाले इस देश को एक बार सोना बना लो,
मन की हर बुराई को उखाड़, एक स्वच्छ भारत बना लो,
ऐ खुदगर्ज इन्सां कुछ रावण से भी सीख लो,
खुद की बुराई ख़त्म करने, अच्छाई से खुद मर मिटा ॥


Friday, September 2, 2016

वक़्त इस कदर बदलता सा जा रहा है,

वक़्त इस कदर बदलता जा रहा है,
हर रिश्ता, रिश्तों से दूर होता जा रहा है,
चुपचाप अब तो फ़ोन से रिश्तों को निभाया जा रहा है,
जो दूर हो गए थे उनको कहीं यहाँ, कहीं वहां ढूँढा जा रहा है,
जो पास रिश्ते थे दूर उनको किया जा रहा है,
नहीं अब आता है वो छुटी वाला रविवार,
दो घडी धूप में बैठ गपशप का दौर ख़त्म से हो रहा है,
छतों की मुंडेर सूनी सी पड़ी रहती हैं, कोई पक्षी भी नज़र कम ही आता है,
बॉलकोनी से दोस्ती निभाई जाने लगी है,
कोई अपना सा लगने वाला पराया सा होता जा रहा है,
वो जो पराये थे न जाने कब अपने से लगने लगे हैं,
नानी- दादी की गोद में सर रख कहानियां सुनना,
बीते दौर का सपना सा होता जा रहा है,
दादा की ऊँगली थामे कोई बचपन पार्कों में नज़र अब आता नहीं है,
बचपन के कांधों पर किताबों का बोझ बढ़ता जा रहा है,
बचपन बंद कमरों में सिमट सा रहा है,
वक़्त इस कदर बदलता सा जा रहा है,