Sunday, May 3, 2015
Wednesday, March 11, 2015
वजूद उनका
सर्द दोपहर,कुहासे में लिपटे सूरज से छन कर आती धूप,
तन को अपने सेंकते देखा जो उनको हमने ,
हाथों की सलवटों और चेहरे की झुर्रियां ,
अहसास उम्र का दिलाने लग गयीं हैं ,
निगाहों में बस अब एक चमक सी ही रह गयी है ,
वरना सांसें तो अंत की दहलीज पर जा खड़ी हैं ,
एक झटका सा मन को यूँ लगा ?
उनकी यादें क्या उनके साथ ही जाएँगी ,
ऐसा होने न देगा मन मेरा ये कह उठा,
सोचा की जीवन था उनका पर पाया हमने भी बहुत है ,
उनके जीवन की हर साँस से हमने भी सीखा बहुत है ,
क्या करूँ कुछ ऐसा की उनके होने का,
अहसास जीवन भर रह जाये साथ हमारे ,
सोच मन में थी ,समेटने की चाह दिल में है ,
उनके जीवन की हर याद अपना बना लूँ ,
इस अहसास के संग हर खट्टी-मीठी याद को पन्नों में बसा लूँ
उनके वजूद के मिटने से पहले उन्हें दिल के कोनों में बिठा लूँ ,
हर याद उनकी अपने संग कुछ इस तरह से संजों लूँ ,
तन को अपने सेंकते देखा जो उनको हमने ,
हाथों की सलवटों और चेहरे की झुर्रियां ,
अहसास उम्र का दिलाने लग गयीं हैं ,
निगाहों में बस अब एक चमक सी ही रह गयी है ,
वरना सांसें तो अंत की दहलीज पर जा खड़ी हैं ,
एक झटका सा मन को यूँ लगा ?
उनकी यादें क्या उनके साथ ही जाएँगी ,
ऐसा होने न देगा मन मेरा ये कह उठा,
सोचा की जीवन था उनका पर पाया हमने भी बहुत है ,
उनके जीवन की हर साँस से हमने भी सीखा बहुत है ,
क्या करूँ कुछ ऐसा की उनके होने का,
अहसास जीवन भर रह जाये साथ हमारे ,
सोच मन में थी ,समेटने की चाह दिल में है ,
उनके जीवन की हर याद अपना बना लूँ ,
इस अहसास के संग हर खट्टी-मीठी याद को पन्नों में बसा लूँ
उनके वजूद के मिटने से पहले उन्हें दिल के कोनों में बिठा लूँ ,
हर याद उनकी अपने संग कुछ इस तरह से संजों लूँ ,
Friday, January 30, 2015
दास्ताँ
कुछ थे सहमे से, कुछ था सहमे से हमारे कदम,
रखा था जिस रोज हमने आपके आँगन में अपने कदम ।
कांपता सा बदन, डरा हुआ सा था दिल हमारा ,
रखा था जिस रोज हमने आपके आँगन में अपने कदम ।
अनजान थे वो रास्ते,अनजान सभी थे रिश्ते,
रखा था जिस रोज हमने आपके आँगन में अपने कदम ।
हाथ थाम आपका चल पड़े आपके साथ विश्वास दिल में था भरा,
अर्पण किया जिन्हें सब वो सम्हालेंगे मेरे कदम
मुश्किलों भरे इस सफर में,अनजान डर दिल में लिए पर विश्वास आप पर कर,
रखा आपके आँगन में कदम
आंसू ढलक निशाँ गालों पर बनाएं
इससे पहले ही आपने पहलू में छिपाया आपने ,
अब कोई ख्वाहिश नहीं, बाकी न कोई शिकवा है सनम ,
हर भूल मेरी माफ़ करना है इल्तज़ा मेरे सनम ,
एक तमन्ना है बस इस दिल में ,
यूँ चलना संग मेरे मिला क़दमों से कदम ॥
रखा था जिस रोज हमने आपके आँगन में अपने कदम ।
कांपता सा बदन, डरा हुआ सा था दिल हमारा ,
रखा था जिस रोज हमने आपके आँगन में अपने कदम ।
अनजान थे वो रास्ते,अनजान सभी थे रिश्ते,
रखा था जिस रोज हमने आपके आँगन में अपने कदम ।
हाथ थाम आपका चल पड़े आपके साथ विश्वास दिल में था भरा,
अर्पण किया जिन्हें सब वो सम्हालेंगे मेरे कदम
मुश्किलों भरे इस सफर में,अनजान डर दिल में लिए पर विश्वास आप पर कर,
रखा आपके आँगन में कदम
आंसू ढलक निशाँ गालों पर बनाएं
इससे पहले ही आपने पहलू में छिपाया आपने ,
अब कोई ख्वाहिश नहीं, बाकी न कोई शिकवा है सनम ,
हर भूल मेरी माफ़ करना है इल्तज़ा मेरे सनम ,
एक तमन्ना है बस इस दिल में ,
यूँ चलना संग मेरे मिला क़दमों से कदम ॥
Wednesday, December 31, 2014
नववर्ष की शुभकामनाएं
लो आ गया फिर एक नया साल लेकर खुशियों की सौगात,
जाते-जाते एक बार फिर याद दिल गया बीते सालों की,
फिर याद दिला गया एक बार याद मीठे बचपन की,
मोहल्ले के एक टी, वी, में एक साथ मानते नए साल की,
, याद दिला गया मूंगफली के साथ गुड़ की ढेली की ,
साथ बैठते धूप सेंकते ठहाकों में गुजरे हसीं लम्हात की,
कुहासे की चादर असमान में और दादी की गर्म बिस्तर की ,
याद दिला गया दादा-दादी और नानी के आशीर्वाद की ,
इंटरनेट और फोन के ज़माने में याद दिला गया ट्रंककाल की,
चिट्ठी-पत्री हुई गुजरे ज़माने की बात की ,
अब तो फोन काल भी हुई बात बीते ज़माने की ,
हर ओर बस गूँज मची है फेसबुक और व्हाट्स आप की ,
कुछ खट्टी कुछ मीठी यादों को छोड़ स्वागत हो नयी उम्मीदों की ,
लो आ गया फिर नया साल ले कर सौगात खुशियों की॥
आप सभी को एक बार फिर से मेरी और से नववर्ष की शुभकामनाएं ॥।
Thursday, December 18, 2014
पुत्र प्यारा माँ का ,
शोर हर ओर इस तरह क्यों मचा हुआ है ,दर्द कोई बांटता क्यों नहीं उस माँ का,
सुबह गया जो काँधे पर बैग टांग ,आया नहीं अभी तक दुलारा आँख का तारा वो माँ का ,
सब अपने - अपनों को तलाशते, कोई एक तो आये आगे बढ़ कम जो करता गम उस माँ का ,
कोई आकर इतना तो बतला जाता उस माँ, को इस जहाँ में अब नहीं है पुत्र प्यारा उस माँ का ,
बंद डब्बे में रखा था खाना माँ ने प्यार से ,क्या पता अब कोई न रहा खाने वाला लाडला उस माँ का ,
अपने पीछे की सीट पर बैठा छोड़कर जो पिता आया ,नहीं आएगा वो पुत्र प्यारा माँ का ,
आँसुंओं से दामन को भिगोती, सोचती काश आज न भेजती जो बेटे को तो साथ होता पुत्र उस माँ का ,
अपने सीने से लगा एक बार जी भर अब कभी भी न रो सकेगी ये दर्द कौन समझेगा माँ का ,
दहशतगर्दों को जन्म दिया है जिस माँ ने,किसी रोज दर्द हो ऐसा तब हाल-ए -दिल देखना है उस माँ का,तो
अब वक्त आ गया है साथ मिल,हो जाओ एक मिटा दो निशान ऐसे बेदर्दों का जिन्होंने आंसू बहाया है माँ का ॥
सुबह गया जो काँधे पर बैग टांग ,आया नहीं अभी तक दुलारा आँख का तारा वो माँ का ,
सब अपने - अपनों को तलाशते, कोई एक तो आये आगे बढ़ कम जो करता गम उस माँ का ,
कोई आकर इतना तो बतला जाता उस माँ, को इस जहाँ में अब नहीं है पुत्र प्यारा उस माँ का ,
बंद डब्बे में रखा था खाना माँ ने प्यार से ,क्या पता अब कोई न रहा खाने वाला लाडला उस माँ का ,
अपने पीछे की सीट पर बैठा छोड़कर जो पिता आया ,नहीं आएगा वो पुत्र प्यारा माँ का ,
आँसुंओं से दामन को भिगोती, सोचती काश आज न भेजती जो बेटे को तो साथ होता पुत्र उस माँ का ,
अपने सीने से लगा एक बार जी भर अब कभी भी न रो सकेगी ये दर्द कौन समझेगा माँ का ,
दहशतगर्दों को जन्म दिया है जिस माँ ने,किसी रोज दर्द हो ऐसा तब हाल-ए -दिल देखना है उस माँ का,तो
अब वक्त आ गया है साथ मिल,हो जाओ एक मिटा दो निशान ऐसे बेदर्दों का जिन्होंने आंसू बहाया है माँ का ॥
Wednesday, October 29, 2014
दीप जलाऊँ तेरे संग
खुशियों और उमंग से भरा दीप लड़ियों का दीपावली है त्यौहार ,
मन हो रहा है उदास उन मासूमों की खतिर ,
नहीं है पास जिनके कोई साधन जो मनाएं वो भी एक बार ख़ुशी से त्यौहार ,
क्या लाऊँ ,क्या बनाऊँ सूची बनाने को मन फिर भी है बेक़रार ,
मिटटी के दिए अपने द्वार जलाने को लायी हूँ मैं इस बार ,
मन में थे यह विचार हो जायेंगे रोशन शायद उनके भी आँगन और द्वार ,
जिनके मिटटी से सने हाथों ने दिया इन दीयों को रूप और आकार ,
चमकती ,सजी दुकानों को छोड़ पीछे ले आयीं मैं शगुन के बर्तन ,
जो सजा कर बैठे थे छोटी सी दुकान को बस एक फिट के फुटपाथ पर,
सोने के नहीं, चांदी के नहीं, लाई हूँ मैं मिटटी के भगवान घर अपने इस बार ,
शायद ऐसा करने से उन मासूम आँखों भी चमक जाएं चांदी से इस बार ,
नकली सुगंधों से भरे फूल मालाओं को मैं छोड़ आई हूँ बाजार में इस बार ,
ख़ुशबुओं से भरे फूलों की लगाउंगी मैं माला अपने द्वार ,
टिमटिमाती बिजली की लड़ियों नहीं जलाऊँगी इस बार ,
मन में सोचा और ले आई हूँ मोमबत्ती के कुछ बण्डल मैं इस बार ,
जिनको तराशा है किसी मासूम से नेत्रहीन के हाथों ने ,
मन में है ख़ुशी और बहुत सा है सुकून यह सोचकर ,
शायद मैंने अपने संग किसी के घर को भी किया रोशन इस बार ……
आओ सब मिलकर मनाएं इसी तरह से कुछ दीवाली और मनाएं हर त्यौहार ॥
मन हो रहा है उदास उन मासूमों की खतिर ,
नहीं है पास जिनके कोई साधन जो मनाएं वो भी एक बार ख़ुशी से त्यौहार ,
क्या लाऊँ ,क्या बनाऊँ सूची बनाने को मन फिर भी है बेक़रार ,
मिटटी के दिए अपने द्वार जलाने को लायी हूँ मैं इस बार ,
मन में थे यह विचार हो जायेंगे रोशन शायद उनके भी आँगन और द्वार ,
जिनके मिटटी से सने हाथों ने दिया इन दीयों को रूप और आकार ,
चमकती ,सजी दुकानों को छोड़ पीछे ले आयीं मैं शगुन के बर्तन ,
जो सजा कर बैठे थे छोटी सी दुकान को बस एक फिट के फुटपाथ पर,
सोने के नहीं, चांदी के नहीं, लाई हूँ मैं मिटटी के भगवान घर अपने इस बार ,
शायद ऐसा करने से उन मासूम आँखों भी चमक जाएं चांदी से इस बार ,
नकली सुगंधों से भरे फूल मालाओं को मैं छोड़ आई हूँ बाजार में इस बार ,
ख़ुशबुओं से भरे फूलों की लगाउंगी मैं माला अपने द्वार ,
टिमटिमाती बिजली की लड़ियों नहीं जलाऊँगी इस बार ,
मन में सोचा और ले आई हूँ मोमबत्ती के कुछ बण्डल मैं इस बार ,
जिनको तराशा है किसी मासूम से नेत्रहीन के हाथों ने ,
मन में है ख़ुशी और बहुत सा है सुकून यह सोचकर ,
शायद मैंने अपने संग किसी के घर को भी किया रोशन इस बार ……
आओ सब मिलकर मनाएं इसी तरह से कुछ दीवाली और मनाएं हर त्यौहार ॥
Tuesday, September 23, 2014
नवसंचार पर्व नवरात्रि ,
ज्ञान,समृद्धि ,अनुकम्पा से परिपूर्ण माँ के पर्व का है प्रतीक नवरात्रि ,
बदलते हुए मौसम संग तन के नवसंचार करने का पर्व है नवरात्रि ,
हो चाहे चैत्र या हो शारदीय ,होते हैं बड़े ही शुभ दिन नवरात्रि के ,
शैलपुत्री ,ब्रह्मचारिणी ,प्रथम और द्व्तीय,चंद्रघंटा तृतीय रूप में कहलाती माँ ,
चतुर्थ रूप में कूष्माण्डा,पंचम स्कंदमाता रूप में पूजी जाती माँ ,
छठम रूप में कात्यानी ,और सप्तम कालरात्रि कहलाती माँ ,
अष्टम तेरा रूप महागौरी है माँ, नवमी में सिद्धिदात्री कहलाती माँ ,
नव रूपों से पूर्ण माँ नवरात्री में महिमा अपरम्पार हो जाती माँ ,
विषम संकटों से भक्तों की नैया पार लगाती माँ ,
करता तेरा स्नेह पूर्वक स्मरण जो उसका बेड़ा पार लगाती माँ
विष्णु प्रिय पुष्प कमल के आसन पर है विराजती तू माँ ,
चामुण्डा रूप में प्रेत पर और वाराही रूप में भैस पर विराजती है माँ ,
माहेश्वरी रूप में बैल पर,तो कौमारी रूप में मोर पर विराजे माँ ,
आभूषणों से विभूषित ब्राह्मी रूप में हंस पर विराजे तू माँ ,
भक्तों की रक्षा करने लिए तू मदेवताओं के कल्याण हेतु
चक्र,गदा,शक्ति,हल,मूसल ,तोमर ,भाल ,त्रिशूल धारण करने वाली माँ
रौद्र रूप में तेरा दर्शन है बहुत ही दुर्लभ माँ ,
पूर्व दिशा मैं ऐन्द्री ,अग्निकोण में अग्निशक्ति माँ ,
दक्षिणी में वाराही देवी भक्तों की रक्षा है करती माँ ,
उत्तर दिशा कौमारी की ,ईशान शूलधारिणी है विराजे ,
जाया और विजय भक्तों की रक्षा करने वाली है माँ ,
जयंती,मंगला ,भद्रकाली ,कपालिनी काली,दुर्गा ,क्षमा ,
शिवा,धात्री ,स्वाहा स्वधा नामों का जिसने किया उच्चार माँ ,
कर देती हर कष्ट से उनका तो कल्याण माँ,
मधु और कैटभ संहारा माँ ,चणड और मुण्ड को है मारा माँ ,
शुंभ और निशुम्भ का कर मर्दन कर ,किया है सबका बेडा पार माँ ,
हे! चण्डिके सर्व बाधाओं से मुक्त करने वाली माँ ,
रोगों का नाश करने वाली,यश ,पराक्रम दिलाने वाली माँ ,
हम सबको सौभाग्य,आरोग्य और परम सुख का वर देना माँ ,
प्रचंड,दैत्यों के अभिमान को पल भर में तूने ही किया चकनाचूर माँ ,
देवी कवच ,अर्गला,कीलक और सप्तसती के पाठ से किया जिसने भी तुझे प्रसन्न माँ ,
किया था तप जब सुरथ राजन ने तब नाश किया कोलविध्वंश दैत्य का माँ
जीवन दान दिया सुरथ को माँ ,
महिषासुर मर्दिनी ,ज्योतिरूपिणी भवबाधाएं हरने वाली माँ ,
कौमारी ,सरस्वती ,ब्रम्हाणी हे वैष्णवी तू है माँ।,
लक्ष्मी,शांति,क्षुधा ,मातृ,तृष्णा रूप में स्थित तेरे हर रूप को है नमस्कार माँ ,
साठ हजार सेनाओं वाले धूम्रलोचन का तूने ही वध किया था माँ ,
ब्रह्म ,शिव ,कार्तिकेय ,विष्णु,इंद्र समस्त देवताओं की शक्तियों से विभूषित होकर माँ
किया दैत्यों का नाश तूने माँ ,
कुमकुम अक्षत और पुष्पों से ,नैवैध ,धूप और अर्चन से माँ,
शुभ नवरात्री के शुभ पवन अवसर पर माँ
तेरे हर रूप,हर श्रृंगार के दर्शन से नवरात्री का पूजन कर माँ ,
अपने जीवन की नैया को पार लगाना हमको है माँ ,
बदलते हुए मौसम संग तन के नवसंचार करने का पर्व है नवरात्रि ,
हो चाहे चैत्र या हो शारदीय ,होते हैं बड़े ही शुभ दिन नवरात्रि के ,
शैलपुत्री ,ब्रह्मचारिणी ,प्रथम और द्व्तीय,चंद्रघंटा तृतीय रूप में कहलाती माँ ,
चतुर्थ रूप में कूष्माण्डा,पंचम स्कंदमाता रूप में पूजी जाती माँ ,
छठम रूप में कात्यानी ,और सप्तम कालरात्रि कहलाती माँ ,
अष्टम तेरा रूप महागौरी है माँ, नवमी में सिद्धिदात्री कहलाती माँ ,
नव रूपों से पूर्ण माँ नवरात्री में महिमा अपरम्पार हो जाती माँ ,
विषम संकटों से भक्तों की नैया पार लगाती माँ ,
करता तेरा स्नेह पूर्वक स्मरण जो उसका बेड़ा पार लगाती माँ
विष्णु प्रिय पुष्प कमल के आसन पर है विराजती तू माँ ,
चामुण्डा रूप में प्रेत पर और वाराही रूप में भैस पर विराजती है माँ ,
माहेश्वरी रूप में बैल पर,तो कौमारी रूप में मोर पर विराजे माँ ,
आभूषणों से विभूषित ब्राह्मी रूप में हंस पर विराजे तू माँ ,
भक्तों की रक्षा करने लिए तू मदेवताओं के कल्याण हेतु
चक्र,गदा,शक्ति,हल,मूसल ,तोमर ,भाल ,त्रिशूल धारण करने वाली माँ
रौद्र रूप में तेरा दर्शन है बहुत ही दुर्लभ माँ ,
पूर्व दिशा मैं ऐन्द्री ,अग्निकोण में अग्निशक्ति माँ ,
दक्षिणी में वाराही देवी भक्तों की रक्षा है करती माँ ,
उत्तर दिशा कौमारी की ,ईशान शूलधारिणी है विराजे ,
जाया और विजय भक्तों की रक्षा करने वाली है माँ ,
जयंती,मंगला ,भद्रकाली ,कपालिनी काली,दुर्गा ,क्षमा ,
शिवा,धात्री ,स्वाहा स्वधा नामों का जिसने किया उच्चार माँ ,
कर देती हर कष्ट से उनका तो कल्याण माँ,
मधु और कैटभ संहारा माँ ,चणड और मुण्ड को है मारा माँ ,
शुंभ और निशुम्भ का कर मर्दन कर ,किया है सबका बेडा पार माँ ,
हे! चण्डिके सर्व बाधाओं से मुक्त करने वाली माँ ,
रोगों का नाश करने वाली,यश ,पराक्रम दिलाने वाली माँ ,
हम सबको सौभाग्य,आरोग्य और परम सुख का वर देना माँ ,
प्रचंड,दैत्यों के अभिमान को पल भर में तूने ही किया चकनाचूर माँ ,
देवी कवच ,अर्गला,कीलक और सप्तसती के पाठ से किया जिसने भी तुझे प्रसन्न माँ ,
किया था तप जब सुरथ राजन ने तब नाश किया कोलविध्वंश दैत्य का माँ
जीवन दान दिया सुरथ को माँ ,
महिषासुर मर्दिनी ,ज्योतिरूपिणी भवबाधाएं हरने वाली माँ ,
कौमारी ,सरस्वती ,ब्रम्हाणी हे वैष्णवी तू है माँ।,
लक्ष्मी,शांति,क्षुधा ,मातृ,तृष्णा रूप में स्थित तेरे हर रूप को है नमस्कार माँ ,
साठ हजार सेनाओं वाले धूम्रलोचन का तूने ही वध किया था माँ ,
ब्रह्म ,शिव ,कार्तिकेय ,विष्णु,इंद्र समस्त देवताओं की शक्तियों से विभूषित होकर माँ
किया दैत्यों का नाश तूने माँ ,
कुमकुम अक्षत और पुष्पों से ,नैवैध ,धूप और अर्चन से माँ,
शुभ नवरात्री के शुभ पवन अवसर पर माँ
तेरे हर रूप,हर श्रृंगार के दर्शन से नवरात्री का पूजन कर माँ ,
अपने जीवन की नैया को पार लगाना हमको है माँ ,
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