Thursday, October 20, 2016

#RavanVadhh कुछ तो गरिमा को रहने दो,

राम ही तो रावण का आधार थे,
हाँ था अहंकार उस रावण में,
पर नहीं था व्यभिचार उस रावण में,
खुद ही मिट जाने के वास्ते ,
परस्त्री का अपहरण किया उसने,
स्पर्श न किया परस्त्री को,
खूबसूरती के पैमानों को न तोलो रंगों के आधार पर,
गुलाब की खूबसूरती को काँटों की चुभन सहना ही पड़ता है,
जहाँ कुर्सी के पीछे एक दुसरे पर कीचड़ उछाला  जाता है,
अब स्वच्छ राजनीती के पैमानों को संसद के भीतर  लाना है,
देश को न बेचो ऐ नेताओं, कुछ तो गरिमा को रहने दो,
इस देश के सम्मान को यूँ इस तरह न रुसवा करो,
सड़कों पर घूमते  रावणों को अब मार गिराना है,
गर्भ में पल रही हर कन्या को भी है बचाना,
जो शहीद हो जाते हैं तुम्हारी खातिर उनके सम्मान को,
हर हाल में सम्मान दिलाना है,
कानून की आँखों की पट्टी को अब है खोल न्याय सबको दिलाना है,
घर में पलते हर रावण को भी जड़ से उखाड़ फेंकना है,
सोने की चिड़िया कहलाने वाले इस देश को एक बार सोना बना लो,
मन की हर बुराई को उखाड़, एक स्वच्छ भारत बना लो,
ऐ खुदगर्ज इन्सां कुछ रावण से भी सीख लो,
खुद की बुराई ख़त्म करने, अच्छाई से खुद मर मिटा ॥


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